सत्संग क्या है? बाबा बागेश्वर ने बताया बड़े भाग्य से क्यों मिलता है सत्संग

सत्संग क्या होता है, सत्संग का क्या अर्थ है और सत्संग कैसे मिलता है? बाबा बागेश्वर के इस कथन में सत्संग का महत्व, भगवान श्रीराम की कृपा और सच्ची भक्ति का गहरा संदेश मिलता है। रामायण की चौपाई के माध्यम से बाबा बागेश्वर बताते हैं कि सत्संग हर किसी को नहीं मिलता, बल्कि इसके लिए भगवान की कृपा भी आवश्यक है।

1. सत्संग क्या है? बड़े भाग्य से मिलता है सत्संग

बाबा बागेश्वर कहते हैं कि बड़े भाग्य से सत्संग मिलता है। सब नहीं सुन पाते। रामायण में लिखा है—

“बड़े भाग पाइ सत्संगा।”

सबको सत्संग नहीं मिलता। बाबा बागेश्वर रामायण की चौपाई का उल्लेख करते हुए कहते हैं—

“बिनु सत्संग विवेक न होई।
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥”

अर्थात भगवान श्रीराम की कृपा के बिना सत्संग प्राप्त नहीं होता। सत्संग को पाने के लिए रामजी की कृपा जरूरी है।

सत्संग क्या है? बाबा बागेश्वर ने बताया बड़े भाग्य से क्यों मिलता है सत्संग
                                              सत्संग क्या है? बाबा बागेश्वर ने बताया बड़े भाग्य से क्यों मिलता है सत्संग

2. सत्संग का क्या अर्थ है? भगवान किसे बुलाते हैं?

देखो, कई लोग ऐसे हैं इसी बांदा में, हमीरपुर में, करतल में, नरैनी में, चित्रकूट में, महोबा में, सतना में, रीवा में, पन्ना में और छतरपुर में। सब नहीं आ पाए। कौन आ पाया? जिसे भगवान ने बुलाया है।

इसी बांदा में कई लोग घर पर टीवी पर देख रहे हैं और रीलें डाल रहे हैं, पोस्ट डाल रहे हैं। पहले के जमाने में कुछ राक्षस होते थे। यज्ञ होता था तो हड्डियां डालते थे। आज के जमाने में पोस्ट डाल दी। समझ गए हम क्या कहना चाह रहे हैं?

इसे हमारी अंग्रेजी में कहते हैं, “सेम टू यू, माय बेटे!”

तो सब नहीं आ पाए। कौन आ पाया? जिसे भगवान ने बुलाया।

आहा! रामायण में गोस्वामी जी ने लिखा—

“बिनु सत्संग विवेक न होई।
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥”

राम कृपा बिनु सुलभ न सोई। बिना रामजी की कृपा के, भैया, सत्संग प्राप्त नहीं हो सकता। सत्संग को पाने के लिए रामजी की कृपा जरूरी है।

3. असली सत्संग क्या है? भगवान की कृपा का महत्व

मेरे पागलों, जितने भी आज बांदा की इस कथा के महोत्सव, महाकुंभ में विराजमान हैं, खड़े हैं, आए हैं, बैठे हैं—भैया, एक बात मान लो, हमारी गांठ बांध लेना। तुम पर भगवान की बहुत कृपा है।

हम लोग भगवान से प्रेम करें, यह आस्था है। क्या है? भक्ति नहीं है, आस्था। तुम यहां आ गए, यह आस्था है।

हम तो कुछ और ही चाहते हैं। पूछो, क्या चाहते हैं?

तुम भगवान से प्रेम करते हो, यह आस्था है, पर भगवान तुमसे प्रेम करने लगें, यह भक्ति है।

आप कथा में आ गए, यह कृपा है, लेकिन प्रभु तुम्हारे जीवन में आ जाएं, यह महाकृपा है।

आप कथा में आ गए, यह भाग्य है, लेकिन प्रभु तुम्हारे जीवन में आ जाएं, यह परम भाग्य है। बोलो, है कि नहीं?

तो कथा में इसलिए नहीं बैठो कि हमारा प्रेम भगवान से हो जाए। इसलिए बैठो कि भगवान को भी हमसे प्रेम हो जाए।

किसी शायर ने लिखा है—

“आज नहीं तो कल इकरार होगा,
हमें इस बंसी वाले से प्यार हुआ है।”

4. सत्संग कैसे मिलता है? हनुमान जी की शरण से कठिन काम भी होते हैं सरल

चौपाई याद है हनुमान चालीसा की? चौपाई बड़ी अद्भुत है—

“दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥”

जय सीताराम!

जब दुनिया में कोई कठिन काम तुम्हारे जीवन में आ जाए, तो हनुमानजी की शरण मांग लेना, ले लेना।

मेरे पागलों, ये दुर्गम काज करने में सक्षम हैं। ये दुर्गम को सुगम कर देते हैं, कठिन को सरल कर देते हैं।

इसलिए तो इन्हें हनुमानजी कहा जाता है। जो कठिन को सरल कर दें, वो हनुमानजी हैं और जो सरल को उपलब्ध करा दें, वो हनुमानजी हैं।

5. सत्संग का क्या मतलब होता है? बाबा बागेश्वर के संदेश से समझें

बाबा बागेश्वर के इस संदेश का भाव है कि सत्संग केवल कथा सुनने या किसी धार्मिक आयोजन में पहुंचने तक सीमित नहीं है। सत्संग के माध्यम से मनुष्य में विवेक जागृत होता है, भगवान के प्रति प्रेम बढ़ता है और जीवन में भक्ति का महत्व समझ में आता है।

रामायण की चौपाई “बिनु सत्संग विवेक न होई, राम कृपा बिनु सुलभ न सोई” सत्संग और भगवान की कृपा के संबंध को समझाती है।

इसलिए सत्संग को केवल एक धार्मिक सभा न समझें, बल्कि इसे भगवान के प्रति प्रेम, श्रद्धा और विवेक को बढ़ाने का अवसर मानें।

जय सीताराम! जय श्री हनुमान!

Leave a comment